पश्चिम एशिया के संघर्ष ने भारत के लिए तेल का जोखिम बढ़ा दिया है। Strait of Hormuz में tanker traffic बुरी तरह प्रभावित है, जबकि Saudi Arabia की महत्वपूर्ण East-West Pipeline पर हमले के बाद इसे सीमित क्षमता पर फिर शुरू किया गया है। दूसरी तरफ Russia से क्रूड खरीद को लेकर अमेरिका के नए सेंक्शन कानून ने भारत के सामने एक और चुनौती खड़ी कर दी है। इसका असर क्रूड प्राइसेज , इम्पोर्ट बिल और आगे चलकर महंगाई पर पड़ सकता है।
नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अब ग्लोबल ऑयल मार्केट पर साफ दिखाई दे रहा है। स्ट्रेट ऑफ हार्मुज और commercial shipping की आवाजाही सामान्य स्तर से काफी नीचे आ गई है। राइटर्स के अनुसार सितंबर के तीसरे सप्ताह में Hormuz से गुजरने वाले commodity vessels की संख्या पिछले सप्ताह के मुकाबले घटकर 17 रह गई थी। जबकि संघर्ष से पहले औसतन करीब 125 vessels रोजाना इस route से गुजरते थे। भारत के लिए यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी crude oil जरूरत का बड़ा हिस्सा import करता है। ऐसे में इंटरनेशनल क्रूड प्राइसेज और freight costs में बढ़ोतरी सीधे भारत के आयात बिल पर दबाव डाल सकती है।
सऊदी की East-West Pipeline पर हमले से बढ़ी चिंता
सऊदी अरब की पूर्व और पश्चिम पाइपलाइन को हॉर्मूज के वैकल्पिक एक्सपोर्ट रूट के तौर पर बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। सितंबर में इस infrastructure पर ड्रोन हमलों के बाद पाइपलाइन को अस्थायी रूप से बंद किया गया था। लेकिन अब स्थिति में बदलाव आया है। Reuters के अनुसार सऊदी अरब ने 22 सितंबर को ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन का संचालन फिर शुरू कर दिया।
भारत के लिए क्यों अहम है यह संकट?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर भारत के import bill, inflation और trade balance पर पड़ सकता है।हालिया आंकड़ों के मुताबिक भारतीय crude basket की कीमत 25 सितंबर के आसपास 123.67 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंची थी। Profit ने PPAC data के हवाले से बताया कि सितंबर का औसत भी अगस्त के मुकाबले काफी ऊंचा रहा। वहीं 25 सितंबर को Brent crude futures करीब 104.32 डॉलर प्रति बैरल और WTI करीब 92.41 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ। इसका मतलब यह है कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में कुछ नरमी आने के बावजूद भारत के लिए तेल की औसत लागत अभी भी ऊंचे स्तर पर है।
रूस से तेल खरीद पर अमेरिका का नया दबाव
दूसरी बड़ी चुनौती रूस से भारत की कच्चा तेल खरीद को लेकर है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सितंबर मे लिंडसे ग्राहम सेक्शनिंग रूस और ईरान एक्ट 2026 पर हस्ताक्षर किए। कानून अमेरिका को रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर भारी tariffs लगाने की शक्ति देता है, जिसमें 100% तक tariff की संभावना शामिल है। हालांकि यहां भी एक जरूरी बात है। 100% टैरिफ भारत पर अपने-आप लागू नहीं हो गया है। अमेरिकी प्रशासन को आगे टारगेट देश और टैरिफ रेट को लेकर प्रक्रिया पूरी करनी होगी। भारत ने कहा है कि वह इसके प्रभाव का अध्ययन कर रहा है और अपनी एनर्जी सिक्योरिटी को प्राथमिकता देगा।
भारत ने रूसी तेल खरीद में बदलाव शुरू किया
अगस्त 2026 में भारत का Russian oil import करीब 2.1 million barrels per day रहा, जो पिछले महीने की तुलना में 16.5% कम था। सितंबर में यह करीब 1.9 million bpd तक और घटने का प्रारंभिक अनुमान था। इसके साथ भारत ने Middle East और दूसरे स्रोतों से supply बढ़ाने की कोशिश की है। यानी भारत के सामने अब दोहरी चुनौती है—एक तरफ महंगा और जोखिम भरा global oil market, दूसरी तरफ Russian crude पर अमेरिकी दबाव।
आम भारतीय पर क्या असर पड़ सकता है?
अगर crude oil लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर रहता है, तो इसका असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। महंगा crude transportation, aviation, chemicals, plastics और कई दूसरे sectors की लागत बढ़ा सकता है। इससे व्यापक महंगाई का दबाव पैदा हो सकता है।हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें तुरंत उसी अनुपात में बढ़ जाएंगी। घरेलू fuel prices पर crude के अलावा taxes, refining margins, rupee-dollar exchange rate और oil marketing companies की pricing policy जैसे कई factors भी असर डालते हैं।
Hormuz संकट भारत के लिए इतना बड़ा risk क्यों?
Strait of Hormuz दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण oil shipping chokepoints में से एक है। यहां traffic में भारी गिरावट आने से exporters और importers दोनों को alternative routes और shipping arrangements तलाशने पड़ रहे हैं। कई रिपोर्ट ने सितंबर में बताया कि Hormuz के जरिए कुछ oil flows जारी रहने के बावजूद vessel traffic सामान्य स्तर से काफी नीचे था।
इस disruption का सीधा असर तीन जगह दिखाई दे सकता है:
- Crude oil prices बढ़ सकती हैं
- Shipping और insurance cost बढ़ सकती है
- India का import bill बढ़ सकता है













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