ईरान युद्ध के बीच बढ़ती ईंधन कीमतों से निपटने के लिए डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से डीजल आपूर्ति की घोषणा की है। शुरुआती खेप 3 लाख टन से अधिक बताई गई है। यूक्रेन ने आशंका जताई है कि इससे रूस की युद्ध संबंधी आर्थिक क्षमता मजबूत हो सकती है। इस बीच, रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने वाले अमेरिकी कानून को लेकर भारत की ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक हित भी चर्चा में हैं।
वॉशिंगटन: पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ती कीमतों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से डीजल आपूर्ति को लेकर बड़ा ऐलान किया है। 9 अक्टूबर 2026 को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ फोन पर बातचीत के बाद ट्रंप ने कहा कि रूस अमेरिका और वैश्विक बाजार के लिए बड़ी मात्रा में डीजल उपलब्ध कराएगा। यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका ने रूस की ऊर्जा आय सीमित करने के लिए कई प्रतिबंध लगाए थे। अब नई घोषणा ने अमेरिकी ऊर्जा नीति और रूस के साथ संबंधों को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
रूस कितने टन डीजल की आपूर्ति करेगा?
रिपोर्टों के मुताबिक, ट्रंप ने रूस से तत्काल 3 लाख टन से अधिक डीजल मिलने की बात कही। इसके बाद नवंबर में 5 लाख टन और फिर 10 लाख टन की अतिरिक्त आपूर्ति की योजना बताई गई। ट्रंप के अनुसार, परिस्थितियां अनुकूल रहने पर आगे 30 लाख टन अतिरिक्त डीजल भी उपलब्ध कराया जा सकता है।
हालांकि, इन आंकड़ों को घोषित आपूर्ति योजना के रूप में समझना जरूरी है। सभी खेपों की वास्तविक डिलीवरी, भुगतान की व्यवस्था और समझौते की पूरी व्यावसायिक शर्तों की स्वतंत्र पुष्टि अभी उपलब्ध रिपोर्टों में नहीं की गई है।ट्रंप ने इस फैसले के पीछे अमेरिकी किसानों, पशुपालकों और ट्रक चालकों के लिए ईंधन की लागत कम करने को प्राथमिकता बताया। अमेरिका में डीजल की कीमतों में उछाल से माल ढुलाई और कृषि क्षेत्र की लागत बढ़ने की चिंता है।
ईरान युद्ध के बीच क्यों अहम हुआ फैसला?
ईरान से जुड़े संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ाई है। तेल की आपूर्ति और परिवहन प्रभावित होने की आशंका से कई बाजारों में ईंधन की कीमतों पर दबाव पड़ा है। इसका असर परिवहन, खाद्य आपूर्ति और औद्योगिक उत्पादन पर भी पड़ सकता है।अमेरिका में 3 नवंबर 2026 को मध्यावधि चुनाव होने हैं।
ऐसे में ईंधन की कीमतें ट्रंप प्रशासन के लिए राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण मुद्दा हैं। रूस से डीजल मंगाने की घोषणा को घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ाने और कीमतों को नियंत्रित करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।हालांकि, विशेषज्ञों ने सवाल उठाया है कि रूसी डीजल की खेपें वैश्विक आपूर्ति में वास्तविक वृद्धि करेंगी या दूसरे देशों के खरीदारों को वैकल्पिक स्रोत तलाशने पड़ेंगे। इसलिए इस समझौते से डीजल की कीमतों में बड़ी गिरावट की गारंटी नहीं है।
प्रतिबंधों में छूट का क्या है मतलब?
फरवरी 2022 में रूस के यूक्रेन पर व्यापक सैन्य हमले के बाद अमेरिका ने रूसी ऊर्जा क्षेत्र पर कई प्रतिबंध लगाए थे। इसी पृष्ठभूमि में रूसी डीजल खरीदने की नई घोषणा को अमेरिकी नीति में महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है।रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने कुछ रूसी डीजल खेपों के लिए अस्थायी छूट जारी की है। यह अनुमति उन निर्धारित खेपों से संबंधित है, जिन्हें तय समय तक टैंकरों पर लोड किया जा चुका था।
रिपोर्टों के मुताबिक, संबंधित छूट अप्रैल 2027 तक प्रभावी रहने की व्यवस्था है।इसका मतलब यह नहीं है कि रूस के खिलाफ सभी प्रतिबंध समाप्त कर दिए गए हैं। छूट का दायरा, लागू शर्तें और प्रत्येक खेप की पात्रता अलग-अलग महत्वपूर्ण हैं।
जेलेंस्की ने क्यों जताई नाराजगी?
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने रूस से डीजल आपूर्ति के फैसले की आलोचना की। उनका कहना है कि रूसी ऊर्जा कारोबार से होने वाली अतिरिक्त कमाई मॉस्को को यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी रखने में मदद कर सकती है।यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया, जब अमेरिकी प्रतिनिधि यूक्रेनी अधिकारियों के साथ युद्ध समाप्त करने के प्रस्ताव पर बातचीत कर रहे थे। जेलेंस्की की प्रतिक्रिया से स्पष्ट है कि ऊर्जा सुरक्षा और युद्ध समाप्त करने की कूटनीतिक कोशिशों के बीच अमेरिका के सामने संतुलन बनाने की चुनौती बनी हुई है।दूसरी ओर, पुतिन ने कहा कि रूस अमेरिकी और वैश्विक बाजारों को तेल और पेट्रोलियम उत्पाद उपलब्ध कराने के लिए तैयार है।
भारत पर 100% टैरिफ का क्या असर पड़ सकता है?
इस मामले का भारत के लिए भी महत्व है। अमेरिका में 18 सितंबर 2026 को Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 पर हस्ताक्षर किए गए। इस कानून में रूसी तेल और प्राकृतिक गैस के प्रमुख खरीदारों सहित कुछ अन्य देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार दिया गया है।
लेकिन कानून में अधिकार दिए जाने और किसी देश पर टैरिफ वास्तव में लागू किए जाने के बीच अंतर है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि भारत पर 100 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ पहले ही लागू हो चुका है।आकाशवाणी समाचार की 23 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ बातचीत में भारत के हितों और चिंताओं को उठाया था। भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों की रक्षा करने की बात कही थी।
आगे क्या हो सकता है?
रूस से डीजल की आपूर्ति बढ़ने से अमेरिकी बाजार को कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन इसका वास्तविक असर डिलीवरी, परिवहन लागत, वैश्विक मांग और पश्चिम एशिया के हालात पर निर्भर करेगा। साथ ही, रूसी ऊर्जा से जुड़े अमेरिकी प्रतिबंधों और संभावित टैरिफ की नीति भी महत्वपूर्ण बनी रहेगी।फिलहाल यह समझौता केवल ईंधन खरीदने का मामला नहीं है।
इसके जरिए अमेरिका की महंगाई संबंधी चुनौतियां, रूस की ऊर्जा आय, यूक्रेन युद्ध और भारत जैसे देशों के व्यापारिक हित एक साथ जुड़ते दिखाई दे रहे हैं। आने वाले समय में वास्तविक आपूर्ति और अमेरिकी सरकार के अगले फैसले तय करेंगे कि इस घोषणा का वैश्विक बाजार पर कितना असर पड़ता है।











