क्या उत्तर प्रदेश आने वाले समय में चार राज्यों में बंट सकता है? यूपी सरकार में मंत्री ओम प्रकाश राजभर के हालिया बयान ने इस पुराने सवाल को फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। राजभर ने पूर्वांचल समेत यूपी के अलग-अलग हिस्सों को अलग राज्य बनाने की बात कही है। हालांकि, फिलहाल ऐसा कोई सरकारी फैसला नहीं हुआ है।
दिलचस्प बात यह है कि यूपी के विभाजन का विचार नया नहीं है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने 1955 में बड़े राज्यों को छोटे राज्यों में बांटने का विचार रखा था, जबकि 2011 में मायावती सरकार ने उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव विधानसभा से पारित कराया था। आखिर यूपी को किन हिस्सों में बांटने की मांग होती रही है और राज्य बनने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है? जानिए पूरी कहानी।
लखनऊ: उत्तर प्रदेश को छोटे राज्यों में बांटने की मांग एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। यूपी सरकार में कैबिनेट मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने सितंबर 2026 में एक जनसभा के दौरान दावा किया कि आने वाले समय में उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में बांटा जा सकता है। उन्होंने संभावित पूर्वांचल राज्य के मुख्यमंत्री को लेकर भी बड़ा बयान दिया।
हालांकि, इस खबर का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि उत्तर प्रदेश के चार राज्यों में विभाजन को लेकर अभी कोई आधिकारिक सरकारी फैसला नहीं हुआ है। राजभर का बयान फिलहाल राजनीतिक दावा है, जिसे केंद्र सरकार की घोषित नीति या अंतिम निर्णय के रूप में पेश नहीं किया जा सकता।
राजभर ने क्या दावा किया?
राजभर ने कहा कि आने वाले समय में उत्तर प्रदेश का चार हिस्सों में विभाजन होगा। उन्होंने अपने बयान में इसे जातीय जनगणना के बाद की स्थिति से जोड़ा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बातचीत का हवाला दिया। यह ध्यान रखना जरूरी है कि प्रधानमंत्री की ओर से ऐसा कोई सार्वजनिक आधिकारिक बयान/घोषणा सामने नहीं आई है, इसलिए राजभर द्वारा बताई गई बातचीत को उसी रूप में यानी उनके दावे के तौर पर माना जाना चाहिए। राजभर ने संभावित पूर्वांचल राज्य को लेकर यह भी कहा कि अगर ऐसा राज्य बनता है तो वहां राजभर समाज से मुख्यमंत्री होना चाहिए। यह भी उनका राजनीतिक बयान है।
राजभर के बताए चार हिस्से कौन से हैं?
हाल के रिपोर्टों में राजभर के प्रस्तावित चार क्षेत्रों के नाम पूर्वांचल, मध्यांचल, बुंदेलखंड और हरित प्रदेश बताए गए हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश को लेकर ‘हरित प्रदेश’ नाम की मांग पहले से भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रही है। यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है-राजभर के मौजूदा चार-क्षेत्र वाले नाम 2011 में मायावती सरकार के प्रस्ताव से पूरी तरह समान नहीं हैं।
2011 में मायावती सरकार ने क्या किया था?
उत्तर प्रदेश के विभाजन का मुद्दा नया नहीं है। नवंबर 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती की सरकार ने उत्तर प्रदेश को चार राज्यों में बांटने का प्रस्ताव विधानसभा में रखा था।विधानसभा ने प्रस्ताव पारित करते हुए चार संभावित राज्यों के नाम बताए थे।
- पूर्वांचल
- बुंदेलखंड
- अवध प्रदेश
- पश्चिम प्रदेश
यह प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया था, लेकिन इससे नए राज्यों का गठन नहीं हुआ। इसलिए 2011 में विधानसभा से प्रस्ताव पारित होना और चार नए राज्यों का बन जाना दो अलग बातें हैं।
आंबेडकर ने भी की थी छोटे राज्यों की वकालत
उत्तर प्रदेश को छोटे राज्यों में बांटने की चर्चा की जड़ें इससे भी पुरानी हैं। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने 1955 की अपनी पुस्तक ‘Thoughts on Linguistic States’ में बड़े राज्यों के आकार को लेकर चिंता व्यक्त की थी और उत्तर प्रदेश को तीन राज्यों में बांटने का सुझाव दिया था। उनका विचार आज की राजभर वाली चार-राज्य अवधारणा से अलग था। इसलिए दोनों प्रस्तावों को एक ही योजना बताना सही नहीं होगा।
क्या यूपी को चार राज्यों में बांटना आसान है?
इसके लिए केवल किसी मंत्री का बयान या राज्य सरकार का प्रस्ताव पर्याप्त नहीं है।भारतीय संविधान का Article 3 संसद को नए राज्य बनाने और मौजूदा राज्यों के क्षेत्र, सीमा या नाम में बदलाव करने की शक्ति देता है। ऐसे मामले में राष्ट्रपति की सिफारिश के बाद संबंधित राज्य की विधानसभा से उसके विचार मांगे जाते हैं और अंतिम कानून संसद के माध्यम से बनता है। यानी अगर भविष्य में यूपी के पुनर्गठन का कोई औपचारिक प्रस्ताव आता है तो उसके लिए लंबी संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरना होगा।
जातीय जनगणना से क्या है कनेक्शन?
राजभर ने अपने बयान में यूपी के संभावित विभाजन को जातीय जनगणना से जोड़ा है। भारत की आगामी जनगणना प्रक्रिया में जातियों की गणना शामिल की जा रही है। उपलब्ध कार्यक्रम के अनुसार जनसंख्या गणना का चरण फरवरी 2027 में होना है। लेकिन यहां भी सावधानी जरूरी है: जातीय जनगणना और उत्तर प्रदेश के विभाजन के बीच कोई घोषित सरकारी संवैधानिक लिंक नहीं है। यह संबंध राजभर के राजनीतिक बयान में बनाया गया है।
इस मुद्दे पर सियासत भी शुरू
राजभर के बयान के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। उनके सहयोगी दलों के नेताओं में भी इस मुद्दे पर एक राय नहीं दिख रही। रिपोर्टों के मुताबिक यूपी सरकार में मंत्री और निषाद पार्टी प्रमुख संजय निषाद ने राज्य के पुनर्गठन की मांग से असहमति जताई, जबकि पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता संजय बालियान ने अलग राज्यों की मांग का समर्थन किया। इससे साफ है कि मुद्दा केवल क्षेत्रीय मांग तक सीमित नहीं है, बल्कि यूपी की आगामी राजनीतिक परिस्थितियों में इसका असर देखने को मिल सकता है।
क्या अभी यूपी चार राज्यों में बंट रहा है?
सितंबर 2026 तक उपलब्ध रिपोर्टों और आधिकारिक संवैधानिक प्रावधानों की जांच के आधार पर उत्तर प्रदेश को चार राज्यों में बांटने की कोई अंतिम सरकारी घोषणा या संसद द्वारा पारित पुनर्गठन कानून नहीं है।फिलहाल मामला ओम प्रकाश राजभर के बयान और पुरानी राजनीतिक मांग तक सीमित है। अगर केंद्र सरकार भविष्य में इस दिशा में औपचारिक कदम उठाती है, तभी जिलों की सीमा, राजधानी, कर्मचारियों, संपत्ति, कर्ज और प्रशासनिक ढांचे के बंटवारे जैसे सवाल वास्तविक प्रक्रिया का हिस्सा बनेंगे।











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