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बिहार में पंचायत टैक्स का नया फॉर्मूला! गांव के घरों को राहत, कारोबार से बढ़ेगी पंचायतों की कमाई

बिहार में ग्राम पंचायतों की कर व्यवस्था में बदलाव की तैयारी है। ग्रामीण आवासीय मकानों पर संपत्ति कर के प्रावधान की समीक्षा के साथ पंचायतों की आय बढ़ाने के लिए व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और स्थानीय सेवाओं से राजस्व जुटाने पर जोर दिया जा रहा है।

पटना: बिहार के ग्रामीण इलाकों में संपत्ति कर को लेकर सरकार अपनी रणनीति में बदलाव की तैयारी कर रही है। ग्राम पंचायतों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए जुलाई 2026 में जिस नई कर व्यवस्था को मंजूरी दी गई थी, उसमें अब ग्रामीण आवासीय मकानों से जुड़े प्रावधानों की समीक्षा की जा रही है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार पंचायती राज विभाग ऐसी व्यवस्था तैयार करने पर काम कर रहा है, जिसमें सामान्य ग्रामीण घरों पर सीधे संपत्ति कर का बोझ कम किया जा सके और पंचायतों की आय बढ़ाने के लिए व्यावसायिक गतिविधियों तथा स्थानीय सेवाओं से राजस्व जुटाया जाए।

जुलाई में लागू हुआ था पंचायतों को टैक्स का अधिकार

बिहार कैबिनेट ने 15 जुलाई 2026 को Gram Panchayat Tax, Cess and Fees Rules, 2026 को मंजूरी दी थी। इसका उद्देश्य ग्राम पंचायतों को अपने स्तर पर राजस्व जुटाने में सक्षम बनाना और विकास कार्यों के लिए राज्य सरकार पर उनकी वित्तीय निर्भरता कम करना था। इस व्यवस्था के तहत पंचायतों को होल्डिंग टैक्स के अलावा व्यावसायिक भवनों, विज्ञापन, बाजार और पंचायत की ओर से उपलब्ध कराई जाने वाली कुछ सेवाओं के लिए शुल्क लेने का अधिकार देने की बात सामने आई थी। बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006 की धारा 27 पंचायतों को निर्धारित नियमों के तहत विभिन्न कर, दर और शुल्क लगाने का कानूनी आधार देती है।

पहले पक्के मकानों पर 100 रुपये तक का प्रावधान

जुलाई में जारी जानकारी के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में आवासीय मकानों के लिए होल्डिंग टैक्स की दरें तय की गई थीं। विभिन्न रिपोर्टों में पक्के मकानों के लिए अधिकतम 100 रुपये सालाना और अर्ध-पक्के मकानों के लिए 50 रुपये सालाना का उल्लेख किया गया था। कच्चे मकानों को होल्डिंग टैक्स से छूट देने की बात भी सामने आई थी। प्रधानमंत्री आवास योजना के मकानों के लिए रियायती दर का उल्लेख भी रिपोर्टों में किया गया था।

इस व्यवस्था का उद्देश्य पंचायतों की अपनी आय यानी Own Source Revenue (OSR) बढ़ाना था। सरकार का तर्क था कि पंचायतों के पास स्थानीय स्तर पर आय के पर्याप्त स्रोत होंगे तो वे बुनियादी सुविधाओं और विकास कार्यों के लिए अधिक आर्थिक रूप से सक्षम हो सकेंगी।

अब ग्रामीण घरों को राहत देने की तैयारी

ताजा जानकारी में ग्रामीण आवासीय संपत्तियों पर सीधे कर लगाने की व्यवस्था में बदलाव की तैयारी की बात सामने आई है। इसके पीछे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों में अंतर को प्रमुख वजह बताया जा रहा है।ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में परिवारों की आय सीमित होती है और उनके मकान अक्सर व्यवसायिक उपयोग में नहीं होते। ऐसे में सरकार पंचायतों की आय बढ़ाने और ग्रामीण परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।यही वजह है कि प्रस्तावित बदलाव में पंचायतों की आय के लिए व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और स्थानीय सेवाओं को अधिक महत्वपूर्ण राजस्व स्रोत बनाने पर जोर दिया जा रहा है।

निजी स्कूल से मोबाइल टावर तक पर नजर

नई व्यवस्था में ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित विभिन्न व्यावसायिक गतिविधियों से कर या शुल्क वसूली का प्रावधान महत्वपूर्ण हो सकता है। उपलब्ध रिपोर्टों में निजी स्कूल, मोबाइल टावर, रेस्टोरेंट, चावल मिल, निजी अस्पताल, ईंट-भट्ठे और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का उल्लेख किया गया है। विज्ञापन, होर्डिंग और बैनर जैसी व्यावसायिक गतिविधियां भी पंचायतों की आय का स्रोत बन सकती हैं। इसके अलावा पंचायतों की ओर से उपलब्ध कराई जाने वाली सेवाओं के बदले शुल्क लेने की व्यवस्था भी पंचायतों के स्थानीय राजस्व को बढ़ाने में मदद कर सकती है।

सरकार का लक्ष्य पंचायतों को आर्थिक रूप से मजबूत करना

पंचायतों को स्थानीय स्तर पर आर्थिक रूप से सक्षम बनाना इस पूरी प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य है। जुलाई में नियमों को मंजूरी देते समय सरकार की ओर से भी पंचायतों के अपने संसाधन बढ़ाने और राज्य सरकार पर निर्भरता कम करने की बात कही गई थी। रिपोर्ट के अनुसार सरकार ने ग्रामीण कर व्यवस्था से लगभग 1,300 करोड़ रुपये अतिरिक्त राजस्व जुटाने का लक्ष्य बताया था।हालांकि, यह अनुमानित राजस्व लक्ष्य है; इसे पंचायतों द्वारा वास्तव में प्राप्त की जा चुकी राशि के रूप में नहीं लिखा जाना चाहिए।

45 हजार से ज्यादा गांवों पर पड़ेगा असर

बिहार में ग्रामीण प्रशासन का नेटवर्क काफी बड़ा है। जुलाई की रिपोर्टों में राज्य में 45,000 से अधिक राजस्व गांव और 8,000 से अधिक ग्राम पंचायतें होने की जानकारी दी गई थी। ऐसे में पंचायत कर व्यवस्था में होने वाला कोई भी बदलाव लाखों ग्रामीण परिवारों और हजारों स्थानीय व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को प्रभावित कर सकता है।

अभी अंतिम फैसला बाकी

सबसे अहम बात यह है कि ग्रामीण घरों पर संपत्ति कर के संबंध में प्रस्तावित बदलाव को अंतिम लागू कानून मानना अभी जल्दबाजी होगी। विभागीय स्तर पर नियमों की समीक्षा और संशोधन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी।इसलिए फिलहाल ग्रामीण परिवारों के लिए सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि जुलाई में स्वीकृत कर व्यवस्था और अक्टूबर में प्रस्तावित संशोधन को अलग-अलग समझा जाए। अंतिम अधिसूचना जारी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि आवासीय मकानों पर कौन-सा कर लागू रहेगा और किन संपत्तियों या व्यावसायिक गतिविधियों से पंचायतें शुल्क वसूल सकेंगी।

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