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22 साल बाद CRPF जवान को राहत, बर्खास्तगी रद्द

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किशोरावस्था में दर्ज आपराधिक मामले के आधार पर CRPF से बर्खास्त किए गए चंद्रेश्वर प्रसाद यादव को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने बर्खास्तगी, अपील और पुनरीक्षण के आदेश रद्द करते हुए 25% बकाया वेतन देने का निर्देश दिया।

किशोरावस्था के केस पर नौकरी से हटाया गया था

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि किशोरावस्था में दर्ज आपराधिक मामले को आधार बनाकर किसी व्यक्ति के वयस्क होने के बाद उसके सरकारी रोजगार में बाधा नहीं डाली जा सकती। कोर्ट ने इसी आधार पर CRPF के पूर्व आरक्षी चंद्रेश्वर प्रसाद यादव की करीब 22 साल पुरानी बर्खास्तगी को रद्द कर दिया है।मामले के अनुसार, चंद्रेश्वर प्रसाद यादव वर्ष 2003 में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) में आरक्षी के पद पर भर्ती हुए थे। भर्ती के बाद ट्रेनिंग के दौरान उनके चरित्र और पूर्ववृत्त का सत्यापन कराया गया। इसी दौरान CRPF को पता चला कि उनके खिलाफ आजमगढ़ में सितंबर 2001 में गाली-गलौज, मारपीट और धमकी से संबंधित मुकदमा दर्ज हुआ था।

सत्यापन में केस सामने आने के बाद हुई बर्खास्तगी

यादव के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 427, 323, 504 और 506 के तहत मामला दर्ज था। आरोप था कि उन्होंने इस मामले की जानकारी सत्यापन फॉर्म में नहीं दी थी। विभाग ने इसे जानकारी छिपाने का आधार मानते हुए 5 अगस्त 2004 को उनकी सेवाएं समाप्त कर दीं। इसके बाद उन्होंने विभागीय अपील और पुनरीक्षण का सहारा लिया, लेकिन दोनों में राहत नहीं मिली।इसके बाद चंद्रेश्वर प्रसाद यादव ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में बर्खास्तगी को चुनौती दी। उनकी ओर से दलील दी गई कि जिस समय उनके खिलाफ मामला दर्ज हुआ था, उस समय वह किशोर थे। इसलिए किशोर न्याय कानून के तहत उस पुराने मामले का उनके वयस्क जीवन और सरकारी सेवा पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।

कोर्ट ने किशोर न्याय कानून के प्रावधानों को माना अहम

हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए किशोरावस्था में किए गए अपराध से जुड़े व्यक्ति के पुनर्वास और भविष्य को प्रभावित न करने के सिद्धांत को महत्व दिया। कोर्ट ने कहा कि किशोरावस्था में दर्ज आपराधिक मामला, यहां तक कि दोषसिद्धि होने की स्थिति में भी, वयस्क होने के बाद सरकारी नौकरी के लिए अयोग्यता का आधार नहीं बनना चाहिए।किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2000 की धारा 19 का उद्देश्य किशोर को किसी अपराध की दोषसिद्धि से जुड़ी अयोग्यता से बचाना था। इसी कानून के तहत किशोर के आपराधिक रिकॉर्ड को लेकर भविष्य में स्थायी कलंक न बनने देने की व्यवस्था की गई थी। समान कानूनी सिद्धांतों को अदालतों ने बाद के मामलों में भी लागू किया है।

मुकदमे में बरी होने के बाद भी नहीं मिली थी नौकरी

इस मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी रहा कि यादव को 28 फरवरी 2005 को मारपीट और गाली-गलौज के मामले में बरी कर दिया गया था। इसके बावजूद विभागीय पुनरीक्षण में इस तथ्य पर उचित विचार नहीं किया गया। हाईकोर्ट ने इसी पृष्ठभूमि में बर्खास्तगी के साथ-साथ अपील और पुनरीक्षण के आदेशों को भी रद्द कर दिया।

20 साल से ज्यादा समय तक सेवा से बाहर रहे

बर्खास्तगी के बाद यादव लंबे समय तक सेवा से बाहर रहे और मामला करीब दो दशक तक न्यायिक प्रक्रिया में चलता रहा। हाईकोर्ट ने उन्हें पूरी पिछली अवधि का वेतन देने के बजाय 25 प्रतिशत बकाया वेतन देने का आदेश दिया। कोर्ट ने माना कि लंबे समय तक सेवा से बाहर रहने और मामले के न्यायिक प्रक्रिया में लंबित रहने की परिस्थितियों को देखते हुए 25 प्रतिशत बकाया वेतन देना उचित होगा।

फैसले का क्या मतलब है?

यह फैसला उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण है जहां किसी व्यक्ति के किशोर रहते दर्ज पुराने आपराधिक मामले को उसके वयस्क जीवन में नौकरी या सेवा के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि सरकारी नौकरी में आपराधिक मामलों से जुड़े मामलों का फैसला हर मामले के तथ्यों, भर्ती नियमों और लागू कानून के आधार पर होता है। इस मामले में हाईकोर्ट ने विशेष रूप से किशोरावस्था के अपराध और किशोर न्याय कानून के संरक्षण को महत्वपूर्ण माना। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चंद्रेश्वर प्रसाद यादव की 5 अगस्त 2004 की बर्खास्तगी, उससे जुड़े अपील और पुनरीक्षण आदेशों को रद्द किया तथा उन्हें 25 प्रतिशत बकाया वेतन देने का निर्देश दिया

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