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आखिर क्यों कर रही है सरकार, सरकारी स्कूलों को बंद: जानिए इसके फायदे और नुक्सान

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नई दिल्ली: निति आयोग के रिपोर्ट के अनुसार UDISE+ के आंकड़ों के आधार पर बताया गया है की देश में वर्ष 2014-15 में सरकारी स्कूलों की संख्या 11.07 लाख थी, जो की वर्ष 2024-25 में घटकर 10.13 लाख हो गयी। निति आयोग के रोपोर्ट के अनुसार पिछले 10 सालो में 94000 सरकारी स्कूलों की कमी हुई है, जिसमे लगभग 8 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई। इसका ये मतलब नहीं है की सारे स्कूलों को अलग-अलग बंद कर दिया है, बल्कि कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को दूसरे स्कूलों के साथ मर्ज या कंसोलिडेट किया गया है।

सरकारी आकड़ो के अनुसार संख्या में बदलाव

वर्षसरकारी स्कूलों की संख्याकमी
2014-1511,07,000
2020-2110,32,04974,951
2021-2210,22,3869,663
2024-2510,13,3229,064
कुल कमी (2014-15 से 2024-25)लगभग 94 हजार
नोट: ये आंकड़े सरकारी स्कूलों की संख्या में बदलाव दिखाते हैं। कुल कमी को केवल “स्कूल बंद होना” नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि इसमें merger, consolidation और rationalisation भी शामिल हैं।

शिक्षा मंत्रालय के UDISE+ आकड़े बताते है की गिरावट एक साल में नहीं हुई है, बल्कि इसकी गिरावट कई सालो से हुई है। राज्यों की बात करें तो उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को बंद करने या दूसरे स्कूलों के साथ मर्ज करने के मामले सबसे ज्यादा देखने को मिले हैं।

क्यों सरकार सरकारी स्कूलों को बंद कर रही है

कई छोटे सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या बहुत कम है और कुछ जगहों पर एक ही शिक्षक को कई कक्षाओं और विषयों के साथ प्रशासनिक काम भी संभालना पड़ता है। इससे बच्चों को पर्याप्त समय और बेहतर सीखने का माहौल देना मुश्किल होता है।इसके अलावा, देश में स्कूली नामांकन भी घटा है। NITI Aayog के अनुसार 2014-15 में कुल नामांकन 26.95 करोड़ था, जो 2024-25 में घटकर 24.69 करोड़ रह गया। ऐसे में सरकार कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को पास के बड़े स्कूलों के साथ मर्ज या consolidate कर रही है, ताकि एक जगह पर्याप्त शिक्षक, बेहतर सुविधाएं और संसाधन उपलब्ध कराए जा सकें।

स्कूल मर्ज करने के पीछे क्या फायदा है?

छोटे स्कूलों को एक बड़े स्कूल के साथ जोड़ने से शिक्षकों और संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो सकता है। एक ही जगह ज्यादा शिक्षक होने से बच्चों को अलग-अलग विषयों पर बेहतर मार्गदर्शन मिल सकता है। इसके अलावा बड़े स्कूलों में खेल, लाइब्रेरी, लैब और दूसरी गतिविधियों के लिए ज्यादा सुविधाएं उपलब्ध होने की संभावना रहती है। इससे बच्चों को पढ़ाई के साथ सामाजिक और दूसरे कौशल विकसित करने के ज्यादा अवसर मिल सकते हैं। इस तरह सही योजना के साथ किया गया स्कूलों का विलय पढ़ाई के माहौल और शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है।

स्कूल मर्ज होने से छात्रों को क्या नुकसान हो सकता है?

स्कूल मर्ज होने के बाद अगर नया स्कूल घर से दूर हो जाए, तो बच्चों के लिए रोज वहां पहुंचना मुश्किल हो सकता है। खासकर ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों में परिवहन की कमी और बढ़ते खर्च से परिवारों की परेशानी बढ़ सकती है। छोटे बच्चों और लड़कियों के लिए लंबी दूरी और सुरक्षा भी चिंता का विषय हो सकती है। ऐसे में कुछ बच्चे स्कूल जाना छोड़ सकते हैं। इसलिए स्कूल मर्ज करते समय दूरी, परिवहन और बच्चों की सुरक्षा का ध्यान रखना जरूरी है।

बच्चों के हित में क्या कदम जरूरी हैं?

स्कूलों के rationalisation का फैसला सिर्फ छात्र संख्या के आधार पर नहीं होना चाहिए। सरकार को स्कूल की दूरी, स्थानीय आबादी, परिवहन, शिक्षकों की उपलब्धता और बच्चों की सुरक्षा जैसी बातों को भी देखना चाहिए। जहां स्कूल मर्ज किया जा रहा है, वहां बच्चों के लिए सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था की जा सकती है। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि नए स्कूल में पर्याप्त शिक्षक और जरूरी सुविधाएं मौजूद हों। सरकार को यह भी लगातार देखना होगा कि स्कूल मर्ज होने के बाद कितने बच्चे नए स्कूल में पहुंच रहे हैं और कितने बच्चे पढ़ाई से बाहर हो रहे हैं।

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